बुधवार, 21 अक्टूबर 2009

ब्लॉग बनाना मेरे लिए बिल्कुल नया अनुभव है । मैंने सुना था की ब्लॉग बनने से आपको सहज ही अनेक अच्छे पाठक मिल जाते है । किंतु मेरा अनुभव तो बिल्कुल ही अलग रहा । मुझे लगता था की ज्योही मैकुछ लिखूंगा तुंरत मुझे उसकी प्रतिक्रिया मिलनी शुरू हो जाएगी । पुरे २४ घंटे हो चुके है किंतु उसे किसी महोनुभाव ने नही पढ़ा। थोडी बहुत प्रतिक्रिया मिले तो ही लिखने का मन बनता है ।

मंगलवार, 20 अक्टूबर 2009

प्लेबैक singing ki samapti

वैसे तो संगीत शुरू से ही फिल्मो की जान रहा है पिछले कुछ समय से इसमे बुनियादी बदलाव आए है । जब तक फ़िल्म संगीत में मेलोडी थी तब तक तो फिल्मो में गायकी का भी दबदबा था किंतु जब से मेलोडी का स्थान हार्मोनी आधारित पाश्चात्य संगीत ने लिया है तब से ऐसा प्रतीत होता है के फिल्मो से गायकी का निष्काशन हो गया है। सवाल ये है की वो कैसे । आप आज के किसी भी गीत को ले लें आप पाएंगे की उन्हें गाने हेतु किसी खाश गायन क्षमता की जरुरत नही है। यही कारन है की आए दिन अभिनेता अथवा स्वयं संगीतकार ही अपने गीत गा लेते है ।इससे साबित होता है की प्रशिक्षित गायकों की आवश्यकता कितनी कम रह गयी है . यही कारन है की मिक्का जैसे बेसुरे गायकों की भी दुकान चल रही है ।