शनिवार, 24 अक्टूबर 2009

suro ke rahee


सुर का मामला बाकी सभी चीजो से जुदा होता है . संगीत सिखाने का मेरा तजुर्बा यही कहता है की जब भी आप किसी को संगीत सिखाते है तो आप उससे अलग तरह का रिश्ता कायम करते है. यह रिश्ता आपको दुनियावी रिस्तो से बिलकुल अलग तरह का अहसास दिलाता है. गुरु और शिष्य का रिश्ता संगीत में जिन अर्थो में लिया जाता है हमेशा वैसे ही रिश्ते नहीं बनते क्योकि प्रायः आपको एक निश्चित समय के लिए कुछ चुनिन्दा व्यक्तियों को तैयार करना होता है . ऐसे में वह रिश्ता गुरु शिष्य का रिश्ता तो नहीं कहा जा सकता . तो फिर वो कौन सा रिश्ता हुआ? मेरे ख्याल से वह और कुछ नहीं सुरों का रिश्ता है. इस रिश्ता में एक अलग तरह की बानगी होती है.

                 मै आजकल छात्रों के एक समूह को नृत्य और संगीत के एक बड़े समारोह हेतु तैयार कर रहा हूँ. इसमें तीन बड़े विद्यालयों की लगभग सत्तर छात्राए शामिल है . इनमे कुछ तो मेरे संदर्भित विद्यालय की ही है . बांकी अन्य पडोसी विद्यालयों की है. उन्हें संगीत हेतु तैयार करते हुए मैंने पाया की उनसे मुझे एक अलग तरह का लगाव हो गया है. मुझे फी उतनी ही मिलनी है जीतनी पहले से तय है किन्तु मै संगीत अभ्यास को ड्यूटी की तरह नहीं कर के यज्ञ की तरह कर रहा हूँ. मेरा रवैया कोच का नहीं रह गया है बल्कि मै दिल से ये चाहता हूँ की वे सबसे बेहतर प्रदर्शन करे . इसके लिए चाहे मुझे जितनी भी मेहनत करनी पडे .मै करूँगा. कुछ छात्राए तो बहुत सुर में होने के साथ ही साथ बहुत समर्पित भी है . ऐसा लगता है मानो मै इस विशाल सत्तर छात्रों से सुरों का अद्भुत रिश्ता रखता हूँ. जिसका सौभाग्य केवेल कलाकारों को ही प्राप्त है.

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